साँसों की जंग और नवाबों के शहर लखनऊ का कमाल: जानिए ‘स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026’ की पूरी कहानी

जब भी देश के सबसे साफ-सुथरे शहरों की चर्चा होती है, तो आमतौर पर इंदौर का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है। लेकिन साल 2026 के ‘स्वच्छ वायु सर्वेक्षण’ ने एक नया और चौंकाने वाला अध्याय लिख दिया है। हवा को सांस लेने योग्य बनाने की इस देशव्यापी होड़ में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ने बाजी मारते हुए पहला स्थान हासिल कर लिया है। 200 में से 198 अंक हासिल करके लखनऊ ने साबित कर दिया है कि अगर सही नीतियां और पक्का इरादा हो, तो जहरीली हवा को भी बदला जा सकता है।

नतीजों का लेखा-जोखा: कौन आगे, कौन पीछे?

10 लाख से अधिक आबादी वाले बड़े शहरों की श्रेणी में लखनऊ जहाँ शीर्ष पर रहा, वहीं इस बार इंदौर दूसरे और मध्य प्रदेश का ही जबलपुर तीसरे स्थान पर रहा।

दूसरी ओर, देश के बड़े महानगरों का प्रदर्शन चिंताजनक रहा। देश की राजधानी दिल्ली 30वें और आर्थिक राजधानी मुंबई 37वें स्थान पर खिसक गई। वहीं चेन्नई, कोलकाता, कोटा, जमशेदपुर और मदुरै जैसे शहर तालिका में सबसे निचले पायदानों पर सिमट कर रह गए।

छोटे और मध्यम शहरों ने भी इस स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया:

  • 3 से 10 लाख आबादी श्रेणी: ओडिशा के राउरकेला ने पहला स्थान पाया, जबकि फिरोजाबाद और गुंटूर संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर रहे।
  • 3 लाख से कम आबादी श्रेणी: कलिंगा नगर ने बाजी मारी, जिसके बाद अनुगुल दूसरे और तालचेर तीसरे स्थान पर रहे।

लखनऊ की जीत का सीक्रेट और ज़मीनी हक़ीक़त

आखिर लखनऊ ने हवा को साफ करने का यह असम्भव सा दिखने वाला काम कैसे किया? इसके पीछे शहर का एक सोच-समझकर तैयार किया गया एक्शन प्लान था:

  • सड़कों की धूल पर लगाम: झाड़ू लगाने की जगह आधुनिक मशीनों (Mechanised Sweeping) से सड़कों की सफाई की गई।
  • ग्रीन और क्लीन ट्रांसपोर्ट: कचरा उठाने वाली गाड़ियों से लेकर सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा दिया गया।
  • कचरा प्रबंधन: खुले में कचरा जलाने पर सख़्त पाबंदी लगाई गई और पुराने कचरे के ढेरों को वैज्ञानिक तरीके से साफ किया गया।
  • जन-भागीदारी: शहर में पार्क और हरियाली बढ़ाने के साथ-साथ आम नागरिकों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया गया।

एक कड़वा सच यह भी है… भले ही लखनऊ ने पहला इनाम जीत लिया हो, लेकिन हवा की गुणवत्ता के मामले में मंज़िल अभी दूर है। सरकार द्वारा तय मानक (60 माइक्रोग्राम/घन मीटर) के मुकाबले लखनऊ का PM10 स्तर अभी 137 पर है। हालांकि, राहत की बात यह है कि साल 2017-18 में यह स्तर 250 था, यानी हवा में बहुत बड़ा और सकारात्मक सुधार आया है।

इसी तरह तीसरे नंबर पर रहे जबलपुर ने ‘कचरे से बिजली बनाने’ (Waste-to-Energy) के प्लांट और 100% वैज्ञानिक कचरा निपटान के बल पर यह मुकाम हासिल किया।

इस बदलाव का मास्टरमाइंड: ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ (NCAP)

शहरों के बीच साफ हवा की यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा अचानक शुरू नहीं हुई। इसके पीछे केंद्र सरकार का राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) काम कर रहा है, जिसे जनवरी 2019 में पर्यावरण मंत्रालय ने लॉन्च किया था।

इस मिशन की मुख्य बातें:

  1. बड़ा लक्ष्य: 2017-18 को आधार वर्ष मानते हुए 2025-26 तक शहरों के PM10 और PM2.5 प्रदूषण में 40% तक की कटौती करना।
  2. स्थानीय स्तर पर काम: हर शहर अपनी भौगोलिक स्थिति और प्रदूषण के मुख्य कारणों (गाड़ियां, उद्योग या धूल) के हिसाब से अपना अलग ‘सिटी एक्शन प्लान’ बनाता है।
  3. चौतरफा निगरानी: निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक धुएं, और वाहनों के प्रदूषण पर कड़े नियम लागू किए जाते हैं।
  4. प्रतिस्पर्धा से सुधार: शहरों की रैंकिंग तय करके उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने के लिए साफ हवा मिल सके।

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