25 जून 2026 को ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि रात्रि 08:09 बजे तक रहेगी, जिसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी। सूर्य उत्तरायण, उत्तर गोल और वर्षा ऋतु में रहेंगे। इस दिन स्वाती नक्षत्र सायं 04:29 बजे तक रहेगा, फिर विशाखा नक्षत्र लगेगा। योग शिव प्रातः 10:54 बजे तक रहेगा, इसके बाद सिद्ध योग का आरंभ होगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 03:53 से 04:39 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:56 से 12:52 बजे तक रहेगा।
सभी एकादशी में निर्जला एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन पूजा के दौरान निर्जला एकादशी की व्रत कथा का श्रवण या पाठ करना आवश्यक माना जाता है। ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। आइए जानते हैं निर्जला एकादशी व्रत की कथा।

निर्जला एकादशी का व्रत इस वर्ष 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा। वैदिक पंचांग के अनुसार, यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर किया जाता है। इस बार एकादशी तिथि 24 जून की शाम 6:12 बजे से आरंभ होकर 25 जून की रात 8:09 बजे तक रहेगी। व्रत रखने वाले श्रद्धालु 25 जून की सुबह स्नान आदि के बाद व्रत और पूजा का संकल्प ले सकते हैं। इस व्रत की खास बात यह है कि इसमें अन्न के साथ-साथ जल का भी त्याग किया जाता है, इसलिए इसे ‘निर्जला’ एकादशी कहा जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का श्रेष्ठ समय प्रातः 5:25 बजे से 7:10 बजे के बीच माना गया है। पूजा के दौरान निर्जला एकादशी की व्रत कथा का श्रवण या पाठ करना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि इससे व्रत का महत्व समझ आता है और इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। व्रत का पारण 26 जून को सूर्योदय के बाद सुबह 8:13 बजे तक किया जा सकता है। मान्यता है कि महाभारत काल में भीमसेन ने यह व्रत किया था, इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा
धार्मिक कथा के अनुसार, एक बार भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनकी माता कुंती और उनके चारों भाई नियमित रूप से व्रत, स्नान और दान करते हैं, लेकिन वे स्वयं उपवास नहीं कर पाते। उन्हें चिंता थी कि बिना व्रत किए उन्हें मोक्ष कैसे प्राप्त होगा। भीमसेन ने अपनी समस्या बताते हुए कहा कि उन्हें अत्यधिक भूख लगती है, इसलिए वे उपवास रखने में असमर्थ हैं।
इस पर वेदव्यास जी ने उन्हें समझाया कि यदि वे स्वर्ग और नरक का अंतर जानते हैं, तो उन्हें प्रत्येक माह आने वाली दोनों एकादशियों का व्रत करना चाहिए। उस दिन अन्न का सेवन न करना ही व्रत का नियम है। लेकिन भीमसेन ने स्पष्ट कहा कि उनके लिए बिना भोजन के रहना संभव नहीं है, क्योंकि उनके पेट में ‘वृक’ नाम की अग्नि है, जो भोजन से ही शांत होती है।
तब उन्होंने विनम्रता से निवेदन किया कि उन्हें ऐसा कोई एक व्रत बताया जाए, जिसे साल में केवल एक बार करके सभी पापों से मुक्ति मिल सके और मोक्ष की प्राप्ति हो। इस पर वेदव्यास जी ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे निर्जला एकादशी कहा जाता है, ऐसा ही व्रत है। इस दिन न अन्न ग्रहण करना होता है और न ही जल। यदि गलती से भी जल पी लिया जाए, तो व्रत का फल नहीं मिलता।
इस व्रत का पालन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय तक किया जाता है। द्वादशी के दिन स्नान, दान-पुण्य करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। जो व्यक्ति इस व्रत को विधि-विधान से करता है, उसे वर्ष भर की सभी 24 एकादशियों का फल प्राप्त होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह सुनकर भीमसेन प्रसन्न हुए और उन्होंने निर्जला एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया। भगवान विष्णु की आराधना करने के बाद द्वादशी के दिन दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें श्रीहरि की कृपा प्राप्त हुई, उनके सभी पाप नष्ट हो गए और अंततः उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई।

निर्जला एकादशी पूजा विधि (Nirjala Ekadashi 2026 Puja Vidhi)
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद पीले या सफेद रंग के कपड़े पहने। सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद भगवान विष्णु का नाम लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
इसके बाद पूजा कक्ष में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति को साफ करें।
भगवान विष्णु को चंदन, अक्षत, पीले फूल, धूप-दीप और खासकर तुलसी दल जरूर अर्पित करना चाहिए।
निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धा भाव के साथ भगवान विष्णु का नाम जाप करें और उनके खास मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।” का जितना हो सके जाप करें।
भगवान विष्णु को भोग में केसरयुक्त खीर और मिठाई का भोग जरूर लगाएं और सच्ची श्रद्धा के साथ आरती करें।
निर्जला एकादशी पर दान का लाभ
सनातन धर्म में दान कर्म अन्य सभी कर्मों से सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। खास कर निर्जला एकादशी के दिन दान करने से कई गुना फल की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म ग्रंथों में दान के महत्व को लेकर एक श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि,
दानेन प्राप्तये स्वर्गो दानेन सुखश्रुते।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः।।
अर्थात्- दान करने से मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है, दान से सुख की प्राप्ति होती है। इस लोक और परलोक दोनों में इंसान पूजनीय योग्य बनता है।
अन्नदान का विशेष पुण्य
इस पुण्यकारी अवसर पर दीन-हीन, असहाय और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। कहा जाता है कि भूखे को अन्न खिलाना सीधे भगवान नारायण की सेवा के समान है। यदि इस दिन कोई साधक दिव्यांग बच्चों, असहाय लोगों या गरीब परिवारों के भोजन हेतु सहयोग करता है, तो उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पारण का सही समय
निर्जला एकादशी का व्रत द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक खोला जाता है। स्नान, पूजा और दान के बाद ही जल और अन्न ग्रहण करना चाहिए।
द्रिक पंचांग के अनुसार 26 जून 2026 को द्वादशी तिथि पर पारण का समय प्रातः 6 बजे से 8 बजकर 39 मिनट तक शुभ माना गया है। पारण से पूर्व भगवान लक्ष्मी-नारायण की पूजा करें और तत्पश्चात अन्नदान करके व्रत खोलें।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी
निर्जला व्रत अत्यंत कठिन होता है क्योंकि इसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। यदि किसी साधक का स्वास्थ्य ठीक न हो, वृद्धावस्था हो, गर्भवती महिला हों या चिकित्सकीय समस्या हो, तो वे केवल पूजा, जप और दान-पुण्य करके भी इस व्रत का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। क्योंकि सनातन धर्म में भावना और श्रद्धा को सर्वोपरि माना गया है।
निर्जला एकादशी भगवान विष्णु की उपासना, आत्मसंयम और दान का महापर्व है। यह व्रत जीवन में पुण्य, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। इस पावन अवसर पर व्रत, पूजा और अन्नदान करके साधक श्रीहरि की कृपा का पात्र बनता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। इस सूचना और तथ्यों की सटीकता एवं संपूर्णता के लिए राइजिंग उत्तर प्रदेश उत्तरदायी नहीं है।
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