आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट, पैन… इनमें से कोई भी नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं। विदेश मंत्रालय के बयान ने फिर छेड़ दी नागरिकता पर नई बहस।
अगर आप यह मानते हैं कि भारत का पासपोर्ट, आधार कार्ड या वोटर आईडी आपके भारतीय नागरिक होने का पर्याप्त प्रमाण हैं तो यह खबर आपको चौंका सकती है। केंद्र सरकार के हालिया स्पष्टीकरण ने नागरिकता को लेकर वर्षों से चली आ रही बहस को फिर हवा दे दी है।
विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ किया है कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि केवल एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है। इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि आखिर भारत में ऐसा कौन-सा दस्तावेज है, जिसे कानूनी रूप से नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जा सके।
आधार कार्ड केवल निवास (Residence) का प्रमाण माना जाता है।
पैन कार्ड करदाताओं की पहचान के लिए है।
ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति का दस्तावेज है।
वोटर आईडी को लेकर भी अदालतें स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह अपने आप में नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है।
अब विदेश मंत्रालय ने यह भी साफ कर दिया कि पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं है।
देश में पहले से ही असम का NRC (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) और विशेष मतदाता पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) जैसी प्रक्रियाएं नागरिकों और गैर-नागरिकों की पहचान के उद्देश्य से चलाई जा चुकी हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी ऐसा कोई एक दस्तावेज मौजूद नहीं है, जिसे कानून की नजर में नागरिकता का अंतिम प्रमाण कहा जा सके।
जानिए! विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
24 जून 2026 को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से पूछा गया कि यदि पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में नागरिक अपनी पहचान कैसे साबित करेंगे? इस पर मंत्रालय ने जवाब दिया कि पासपोर्ट केवल यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है। नागरिकता का निर्धारण अलग कानून के तहत होता है। यही बयान अब देशभर में नई बहस का कारण बन गया है।
पासपोर्ट को अंतिम प्रमाण क्यों नहीं माना जाता?
इसका कारण भारतीय पासपोर्ट अधिनियम, 1967 में छिपा है। कानून की धारा 20 के तहत केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में ऐसे लोगों को भी यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है, जो भारतीय नागरिक नहीं हैं। अतीत में तिब्बती शरणार्थियों और बांग्लादेश से विस्थापित कुछ लोगों को भी ऐसे पहचान-पत्र या यात्रा दस्तावेज जारी किए गए थे। यही वजह है कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता।
कुछ यूं बदलता गया नागरिकता कानून
1955 का नागरिकता अधिनियम कहता था कि 1 जनवरी 1950 के बाद भारत में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय नागरिक होगा। लेकिन बाद के संशोधनों में यह व्यवस्था लगातार सख्त होती गई। 1986 के संशोधन के मुताबिक, 1 जुलाई 1987 के बाद जन्म लेने वाले व्यक्ति के लिए यह शर्त जोड़ दी गई कि उसके माता या पिता में से कम-से-कम एक भारतीय नागरिक होना चाहिए। 2003 के संशोधन के मुताबिक, 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्म लेने वालों के लिए नियम और कठोर हो गया। अब नागरिकता तभी मिलेगी जब एक अभिभावक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) न हो।
पूर्व विदेश सचिव ने क्या कहा?
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने अपने एक्स के वॉल पर इस पूरे प्रकरण को बहुत बढ़िया तरीके से समझाने की कोशिश की है। उन्होंने विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण को कानूनी रूप से सही ठहराते हुए लिखा है- पासपोर्ट इसलिए जारी किया जाता है क्योंकि सरकार उस समय उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक मानती है। लेकिन यदि किसी अदालत में नागरिकता पर विवाद होता है तो अंतिम फैसला नागरिकता अधिनियम के तहत ही होगा, सिर्फ पासपोर्ट के आधार पर नहीं। लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि पासपोर्ट का व्यावहारिक महत्व कम हो गया है।
राव का कहना है कि पासपोर्ट तभी जारी किया जाता है जब सरकार यह सुनिश्चित कर लेती है कि आवेदक इसके लिए पात्र है। सामान्य जीवन और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान यह अधिकांश भारतीयों के पास उपलब्ध भारतीय राष्ट्रीयता का सबसे मजबूत प्रमाण होता है। विदेश मंत्रालय के हालिया स्पष्टीकरण से इस वास्तविकता में कोई बदलाव नहीं आता। विदेशों में कोई भी इमिग्रेशन अधिकारी केवल इसलिए भारतीय पासपोर्ट पर संदेह नहीं करेगा कि नई दिल्ली में उसके कानूनी स्वरूप को लेकर कोई स्पष्टीकरण दिया गया है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान जरूर खींचा है।
भारत में नागरिक पंजीकरण (Civil Registration) की व्यवस्था कई दशकों तक असमान रूप से विकसित हुई। करोड़ों ऐसे भारतीय हैं जिनका जन्म उस दौर में हुआ जब जन्म पंजीकरण की व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं थी। कई लोगों के नाम स्कूल प्रमाणपत्रों, भूमि अभिलेखों और मतदाता सूची में अलग-अलग तरीके से दर्ज हुए। इस पूरे घटनाक्रम से मिलने वाली सीख यह नहीं है कि पासपोर्ट का महत्व कम हो गया है, बल्कि यह है कि भारत को नागरिक पंजीकरण प्रणाली को और मजबूत बनाने, सार्वभौमिक जन्म पंजीकरण सुनिश्चित करने तथा सरकारी अभिलेखों को अधिक विश्वसनीय बनाने की जरूरत है, ताकि किसी नागरिक की पहचान अधूरे या विरोधाभासी दस्तावेजों की मोहताज न रहे।
कई बार कानूनी रूप से बिल्कुल सटीक बयान भी, यदि उसके साथ उचित व्याख्या न दी जाए, तो अनावश्यक सार्वजनिक चिंता पैदा कर देता है। इसे कुछ इस तरह कहा जाता तो शायद बेहतर होता, “पासपोर्ट केवल तभी जारी किया जाता है जब सरकार यह सत्यापित कर लेती है कि आवेदक भारतीय नागरिक है। नागरिकता का अंतिम निर्धारण भले ही नागरिकता अधिनियम के तहत होता हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय यात्रा और सामान्य जीवन में पासपोर्ट भारत गणराज्य द्वारा जारी किया जाने वाला सबसे विश्वसनीय दस्तावेज है और भारत की राष्ट्रीयता का सबसे स्पष्ट प्रमाण भी।”
राव कहती हैं कि उक्त कथन कानूनी रूप से भी सही होता और लोगों में भरोसा भी कायम रखता। कानून की शुद्धता बनाए रखना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि देश के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक पर जनता का विश्वास कमजोर न पड़े।
सरकार पूरी तरह से कन्फ्यूज
नागरिकता को लेकर सरकार की असमंजस की स्थिति नई नहीं है। 2020 में CAA विवाद के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि नागरिकता साबित करने के लिए जन्मतिथि और जन्मस्थान से जुड़े दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। संभावित दस्तावेजों की सूची में शामिल थे- वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार, ड्राइविंग लाइसेंस, जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र , भूमि या मकान से जुड़े सरकारी दस्तावेज। लेकिन सरकार ने यह भी स्वीकार किया था कि इन दस्तावेजों की अंतिम सूची अभी तय नहीं हुई है। यानी छह साल बाद भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी है।
नागरिकों की सबसे बड़ी चुनौती
भारत में करोड़ों लोगों के पास आज भी जन्म प्रमाणपत्र नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बड़ी आबादी के पास ऐसे औपचारिक दस्तावेज नहीं हैं जिनके आधार पर वह आसानी से नागरिकता साबित कर सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में लगभग 9.26 करोड़ लोगों के पास वैध पासपोर्ट है। 89 प्रतिशत से अधिक जन्म पंजीकरण हो चुके हैं। लेकिन जन्म पंजीकरण और जन्म प्रमाण पत्र, दोनों हमेशा एक ही बात नहीं होते।
इस मसले का विश्लेषण किया जाए तो यह विवाद केवल कानूनी तकनीक भर का नहीं है। इसके राजनीतिक मायने कहीं अधिक गहरे हैं। पिछले कुछ वर्षों में NRC, CAA, NPR और अब मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) जैसे मुद्दों ने नागरिकता को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। ऐसे समय में यदि सरकार स्वयं यह स्पष्ट नहीं कर पा रही कि नागरिकता का अंतिम प्रमाण क्या होगा, तो आम नागरिकों में असमंजस बढ़ना स्वाभाविक है।
विपक्ष इसे सरकार की नीतिगत अस्पष्टता और प्रशासनिक विफलता के रूप में पेश कर सकता है, जबकि सरकार का तर्क है कि नागरिकता का निर्धारण हमेशा नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के अनुसार ही होगा, न कि किसी एक दस्तावेज के आधार पर। सबसे बड़ा सवाल यही है यदि भविष्य में व्यापक स्तर पर नागरिकता सत्यापन या मतदाता सूची की जांच होती है तो क्या देश के हर नागरिक के पास ऐसा दस्तावेज होगा जिसे सरकार और अदालत दोनों स्वीकार करें? फिलहाल इसका स्पष्ट समाधान किसी के पास नहीं है।
By प्रवीण कुमार, Senior Journalist, Delhi
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