परिसीमन बिल क्या है ? परिसीमन बिल अहम क्यों ? विधेयक की मुख्य विशेषताएंऔर चिंताएँ

परिसीमन बिल क्या है ?
संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में यह प्रावधान है कि लोकसभा की सीटों का परिसीमन प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाएगा और यह नवीनतम जनगणना पर आधारित होगा। परिसीमन बिल एक विधायी प्रस्ताव है जो देश या राज्य में जनसंख्या के अनुसार चुनावी क्षेत्रों (निर्वाचन क्षेत्रों) की सीमाओं को फिर से तय करने से संबंधित है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो और सभी का उचित प्रतिनिधित्व हो सके। जनसंख्या के अनुपात में परिसीमन: संविधान संशोधन बिल प्रत्येक राज्य में उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों के सिद्धांत पर वापस लौटता है। · किस जनगणना का इस्तेमाल होगा, संसद तय करेगी, परिसीमन विधेयक में आमतौर पर यह बताया जाता है कि परिसीमन प्रक्रिया कैसे होगी, इस प्रक्रिया का संचालन कौन करेगा, जो आमतौर पर एक स्वतंत्र आयोग होता है, और चुनावी सीमाओं के पुनर्निर्धारण का मार्गदर्शन करने वाले बुनियादी सिद्धांत क्या होंगे, जैसे कि समान जनसंख्या, भौगोलिक निरंतरता और प्रशासनिक सुविधा।

परिसीमन बिल अहम क्यों?
बीजेपी के लिए परिसीमन विधेयक को काफ़ी अहम माना जा रहा है.
परिसीमन से लोकसभा में अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व दक्षिणी, पश्चिमी और छोटे राज्यों की तुलना में काफ़ी बढ़ जाएगा. उत्तर भारत में बीजेपी पहले से ही बहुत मज़बूत स्थिति में है.
सरकार की परिसीमन को आगे बढ़ाने की पहली कोशिश केवल दो महीने पहले विफल हुई थी. सरकार ने इसे महिला आरक्षण जैसे व्यापक रूप से लोकप्रिय मुद्दे से जोड़ा था.
विपक्षी दल इस विधेयक के ख़िलाफ़ एकजुट हो गए. उनका तर्क था कि इससे अधिक जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी राज्यों को असमान रूप से लाभ मिलेगा, जहाँ बीजेपी को मज़बूत समर्थन हासिल है जबकि उन राज्यों को नुक़सान होगा, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है.
1976 से लोकसभा सीटें व्यावहारिक रूप से 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बनी हुई हैं. अगर इस रोक को हटाया जाता है तो चीज़ें जटिल हो सकती हैं. उत्तरी राज्य अपनी बढ़ती आबादी के अनुरूप अधिक सीटों की मांग करेंगे, जो एक व्यक्ति, एक वोट के लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुरूप है.
वहीं दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव घट सकता है, जबकि वे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में असमान रूप से अधिक योगदान देते हैं और जनसंख्या नियंत्रण के संघीय लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि छोटे पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों के और अधिक हाशिये पर जाने की आशंका भी है.

परिसीमन विधेयक की मुख्य विशेषताएं:
सीटों में वृद्धि: इस बिल के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रस्ताव है।
महिला आरक्षण: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 1/3 (यानी 33%) आरक्षण देने के लिए सीटों का नए सिरे से परिसीमन (सीमांकन) किया जाना आवश्यक है, जिसे यह बिल सुनिश्चित करता है।
जनसंख्या आधार: यह बिल 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के जमाव (Freeze) को हटाकर जनसंख्या-आधारित वितरण को बहाल करता है।
संसद के हाथ में निर्णय: यह बिल अनिवार्य करता है कि परिसीमन कब किया जाएगा और किस जनगणना को आधार बनाया जाएगा, यह निर्णय संसद द्वारा साधारण कानून के माध्यम से लिया जाएगा।

मुद्दे और चिंताएँ:
परिसीमन महत्वपूर्ण तो है, लेकिन इससे जुड़ी कुछ समस्याएं भी हैं।
विपक्षी समूहों ने किसी विशेष राजनीतिक दल के मतदाता आधार को बढ़ाने के लिए सीमाओं में हेरफेर की संभावना के बारे में चिंता व्यक्त की है; दूसरे शब्दों में, चुनावी क्षेत्रों का मनमाना निर्धारण (जेरीमैंडरिंग)।
इसलिए, परिसीमन प्रक्रिया के दौरान पारदर्शिता, निष्पक्षता और जनविश्वास को बनाए रखना आवश्यक है।
इसके अलावा, निर्वाचन क्षेत्र के आकार में बार-बार होने वाले बदलाव मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा कर सकते हैं और चुनाव कराने में प्रशासनिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकते हैं, खासकर यदि चुनाव बदलाव होने के तुरंत बाद आयोजित किए जाते हैं।

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