2024 में बीजेपी 240 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी लेकिन सरकार बनाने के लिए 272 सीटें की ज़रूरत होती है, बीजेपी को साधारण बहुमत से 32 सीटें कम मिली थीं
ऐसे में मोदी सरकार एनडीए (NDA) के सहयोगी दलों के समर्थन से चल रही है

लोकसभा में सीटों के लिहाज से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देसम पार्टी (टीडीपी) 16 सीटों के साथ एनडीए में सबसे बड़ा सहयोगी दल था. वहीं नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड लोकसभा सीटों के लिहाज से एनडीए की दूसरी बड़ी पार्टी थी. जेडीयू के 12 सांसद हैं.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 20 बाग़ी सांसदों ने एक अनजान सी नेशनल सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया में ख़ुद को शामिल कर लिया और एनडीए को समर्थन देने की घोषणा कर दी. यानी लोकसभा में अब एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी ये अनजान सी पार्टी हो गई है.
इसी तरह एकनाथ शिंदे की शिव सेना को 2024 के लोकसभा चुनाव में सात सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इसी महीने उद्धव ठाकरे की शिव सेना के छह सांसदों ने पाला बदल लिया और शिंदे गुट में आ गए.
यानी एकनाथ शिंदे की शिव सेना के पास अब कुल 13 सांसद हो गए हैं. लोकसभा में जेडीयू से भी बड़ी पार्टी शिव सेना हो गई है. एकनाथ शिंदे की शिव सेना पहले से ही एनडीए के साथ है.
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के भी पाँच लोकसभा सांसद हैं. इसके अलावा भी कुछ छोटी-छोटी पार्टियां हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 293 सीटों पर जीत मिली थी लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 319 हो गई है.
बीजेपी अब उन आंकड़ों के क़रीब पहुंच रही है, जो अहम संवैधानिक संशोधनों को पारित कराने के लिए अनिवार्य हैं.
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद भी टूटकर अलग हुए और सीधे बीजेपी में शामिल हो गए हैं.
डीएमके के लोकसभा में 22 सांसद हैं और इसने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली है. डीएमके भी बीजेपी सरकार को मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकती है.
अभी लोकसभा में कुल 540 सांसद हैं. ऐसे में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 पर पहुँचता है. बीजेपी अब भी दो तिहाई बहुमत से दूर है.
लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का आँकड़ा 362 है, क्योंकि सदन की कुल संख्या 543 है.
फ़िलहाल तीन लोकसभा सीटें ख़ाली हैं. असम की नागांव, पश्चिम बंगाल की बसीरहाट और मेघालय की शिलॉन्ग. एनडीए को उम्मीद है कि वह तीनों सीटें जीत सकता है.
अगर एनडीए तीनों उपचुनाव जीत लेता है तो परिसीमन विधेयक पर सरकार को 323 वोट तक मिलने की उम्मीद हो सकती है.
इसके बावजूद, वह दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से अब भी कम-से-कम 20 सीट दूर रहेगी.
डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन भले ना मिले लेकिन कम-से-कम मतदान से दूर रहने के लिए मनाया जा सकता है.
हाल के महीनों में एनडीए राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े 164 के क़रीब पहुंच गया है. राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 है.
बीजू जनता दल छोड़ने के बाद 12 जून को देबाशीष सामंतराय बीजेपी के टिकट पर निर्विरोध निर्वाचित हुए. इससे बीजेपी की राज्यसभा में संख्या बढ़कर 115 हो गई.
इसके अलावा, एनडीए को अब उच्च सदन में कम-से-कम 149 सांसदों का समर्थन हासिल है.
27 सीटों के लिए चल रहे राज्यसभा चुनाव 28 जून को समाप्त होने के बाद एनडीए की संख्या में तीन और सीटों की बढ़ोतरी होने की संभावना है.
इसके बाद, जब भी उन ख़ाली सीटों पर चुनाव होंगे जो टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के इस्तीफे के कारण खाली हुई हैं तब एनडीए अपने खाते में तीन और सीटें जोड़ सकता है.
टीएमसी के पास अब राज्यसभा में केवल 10 सांसद बचे हैं.
कुछ छोटे दल भी हैं जो न एनडीए के साथ हैं और न ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं.
इनमें वाईएसआर कांग्रेस (7 सांसद), बीजू जनता दल (5 सांसद), आम आदमी पार्टी और भारत राष्ट्र समिति (3-3 सांसद) के अलावा बीएसपी (1 सांसद) शामिल हैं.
परिसीमन विधेयक पर मतदान के दौरान डीएमके के आठ सांसदों के मतदान से दूर रहने की भी संभावना जताई जा रही है.
बीजेपी का पूरा ज़ोर है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन बिल पास करवा लिया जाए.
परिसीमन का सीधा फ़ायदा बीजेपी को होगा और महिला आरक्षण पास कराने का श्रेय भी ले लेगी. जिस तरह से क्षेत्रीय पार्टियों में टूट जारी है, वैसे में दो तिहाई का बहुमत हासिल करना बहुत मुश्किल नहीं रह जाएगा. चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश से बाहर का सोचते नहीं हैं. उन्हें बस केंद्र से फंड मिलता रहे. बीजेपी को केंद्र में सरकार चलाने के लिए अब टीडीपी पर उस तरह से निर्भरता नहीं रही.”
परिसीमन बिल अहम क्यों?
बीजेपी के लिए परिसीमन विधेयक को काफ़ी अहम माना जा रहा है.
परिसीमन से लोकसभा में अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व दक्षिणी, पश्चिमी और छोटे राज्यों की तुलना में काफ़ी बढ़ जाएगा. उत्तर भारत में बीजेपी पहले से ही बहुत मज़बूत स्थिति में है.
सरकार की परिसीमन को आगे बढ़ाने की पहली कोशिश केवल दो महीने पहले विफल हुई थी. सरकार ने इसे महिला आरक्षण जैसे व्यापक रूप से लोकप्रिय मुद्दे से जोड़ा था.
विपक्षी दल इस विधेयक के ख़िलाफ़ एकजुट हो गए. उनका तर्क था कि इससे अधिक जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी राज्यों को असमान रूप से लाभ मिलेगा, जहाँ बीजेपी को मज़बूत समर्थन हासिल है जबकि उन राज्यों को नुक़सान होगा, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है.
1976 से लोकसभा सीटें व्यावहारिक रूप से 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बनी हुई हैं. अगर इस रोक को हटाया जाता है तो चीज़ें जटिल हो सकती हैं. उत्तरी राज्य अपनी बढ़ती आबादी के अनुरूप अधिक सीटों की मांग करेंगे, जो एक व्यक्ति, एक वोट के लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुरूप है.
वहीं दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव घट सकता है, जबकि वे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में असमान रूप से अधिक योगदान देते हैं और जनसंख्या नियंत्रण के संघीय लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि छोटे पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों के और अधिक हाशिये पर जाने की आशंका भी है.
परिसीमन बिल क्या है ?
संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में यह प्रावधान है कि लोकसभा की सीटों का परिसीमन प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाएगा और यह नवीनतम जनगणना पर आधारित होगा। परिसीमन बिल एक विधायी प्रस्ताव है जो देश या राज्य में जनसंख्या के अनुसार चुनावी क्षेत्रों (निर्वाचन क्षेत्रों) की सीमाओं को फिर से तय करने से संबंधित है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो और सभी का उचित प्रतिनिधित्व हो सके। जनसंख्या के अनुपात में परिसीमन: संविधान संशोधन बिल प्रत्येक राज्य में उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों के सिद्धांत पर वापस लौटता है। · किस जनगणना का इस्तेमाल होगा, संसद तय करेगी, परिसीमन विधेयक में आमतौर पर यह बताया जाता है कि परिसीमन प्रक्रिया कैसे होगी, इस प्रक्रिया का संचालन कौन करेगा, जो आमतौर पर एक स्वतंत्र आयोग होता है, और चुनावी सीमाओं के पुनर्निर्धारण का मार्गदर्शन करने वाले बुनियादी सिद्धांत क्या होंगे, जैसे कि समान जनसंख्या, भौगोलिक निरंतरता और प्रशासनिक सुविधा।
परिसीमन विधेयक की मुख्य विशेषताएं:
सीटों में वृद्धि: इस बिल के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रस्ताव है।
महिला आरक्षण: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 1/3 (यानी 33%) आरक्षण देने के लिए सीटों का नए सिरे से परिसीमन (सीमांकन) किया जाना आवश्यक है, जिसे यह बिल सुनिश्चित करता है।
जनसंख्या आधार: यह बिल 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के जमाव (Freeze) को हटाकर जनसंख्या-आधारित वितरण को बहाल करता है।
संसद के हाथ में निर्णय: यह बिल अनिवार्य करता है कि परिसीमन कब किया जाएगा और किस जनगणना को आधार बनाया जाएगा, यह निर्णय संसद द्वारा साधारण कानून के माध्यम से लिया जाएगा।
मुद्दे और चिंताएँ:
परिसीमन महत्वपूर्ण तो है, लेकिन इससे जुड़ी कुछ समस्याएं भी हैं।
विपक्षी समूहों ने किसी विशेष राजनीतिक दल के मतदाता आधार को बढ़ाने के लिए सीमाओं में हेरफेर की संभावना के बारे में चिंता व्यक्त की है; दूसरे शब्दों में, चुनावी क्षेत्रों का मनमाना निर्धारण (जेरीमैंडरिंग)।
इसलिए, परिसीमन प्रक्रिया के दौरान पारदर्शिता, निष्पक्षता और जनविश्वास को बनाए रखना आवश्यक है।
इसके अलावा, निर्वाचन क्षेत्र के आकार में बार-बार होने वाले बदलाव मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा कर सकते हैं और चुनाव कराने में प्रशासनिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकते हैं, खासकर यदि चुनाव बदलाव होने के तुरंत बाद आयोजित किए जाते हैं।
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