भक्ति और उल्लास से सजे शारदीय नवरात्रि के छठे दिन, उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध मीरजापुर स्थित विंध्याचल धाम का माहौल पूरी तरह से आध्यात्मिक हो चुका है। आज का दिन विशेष रूप से जगत जननी मां दुर्गा के छठे स्वरूप, माता कात्यायनी को समर्पित है। यही वजह है कि देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें सुबह से ही मां विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में लगी हुई हैं। हर तरफ गूंजते माता के जयकारे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भक्तों की आस्था पर समय और दूरी का कोई असर नहीं पड़ता।

अलौकिक है मां कात्यायनी का रूप
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, सिंह पर आसीन मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और सोने की भांति चमकता हुआ है। उनकी चार भुजाएं भक्तों पर हमेशा अपनी कृपा बरसाती हैं—एक हाथ अभय मुद्रा में सुरक्षा का अहसास कराता है, तो दूसरा वरद मुद्रा में झोलियां भरता है, जबकि बाकी हाथों में कमल का पुष्प और तलवार सुशोभित होती है। मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से माता की शरण में आता है, उसके जीवन के सारे कष्ट और बाधाएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।
विंध्याचल धाम की खास महिमा और पौराणिक कथा
मां गंगा के पावन तट पर बसे विंध्याचल की धरती पर माता कात्यायनी का यह धाम किसी अलौकिक लोक से कम नहीं है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, कत्य ऋषि के वंश में जन्में महान महर्षि कात्यायन ने भगवती को अपनी पुत्री रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इस साधना से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके आश्रम में जन्म लिया और आगे चलकर ‘कात्यायनी’ के नाम से विख्यात हुईं।
योग साधना और जीवन में महत्व
योग और अध्यात्म की दृष्टि से भी नवरात्रि का छठा दिन बेहद खास माना जाता है। इस दिन साधकों का मन मुख्य रूप से ‘आज्ञा चक्र’ में केंद्रित होता है। ऐसा विश्वास है कि माता कात्यायनी की आराधना करने से न सिर्फ भीतर असीम आत्मविश्वास और साहस का संचार होता है, बल्कि इंसान को जीवन के चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—की प्राप्ति भी सहजता से हो जाती है। दयालु मां अपने हर बच्चे की मुराद पूरी करती हैं और धाम की सीढ़ियां चढ़ते ही भक्तों का मन एक अजीब सी शांति से भर जाता है।
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