धर्मनगरी वाराणसी के भदैनी इलाके में आधी रात से ही एक अनोखा नजारा देखने को मिलता है। दूर-दराज से आए हजारों-लाखों जोड़ों की आंखों में एक ही सपना तैरता है—घर में बच्चे की किलकारी सुनना। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी (17 सितंबर, 2026) को मनाए जाने वाले ‘लोलार्क षष्ठी’ पर्व पर काशी की गलियों में सिर्फ भक्ति, आस्था और उम्मीद की बयार बहती है। कई किलोमीटर लंबी कतारों में रात-रात भर खड़े होकर पति-पत्नी उस घड़ी का इंतजार करते हैं, जब उन्हें कुंड के पवित्र पानी में उतरने का मौका मिलेगा। ज्योतिषियों के मुताबिक 17 सितंबर, 2026 बृहस्पतिवार की सुबह 6:31 से 10:26 बजे तक पूजा-अर्चना और स्नान का सबसे शुभ काल रहा।

सूर्यदेव के रथ का पहिया और उल्टे पिरामिड की रहस्यमयी बनावट
इस पावन स्थान से जुड़ी मान्यता बेहद दिलचस्प है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहीं पर सूर्यदेव के दिव्य रथ का पहिया गिरा था, जिसके बाद यह कुंड बना और इसका नाम ‘लोलार्क’ पड़ा। लगभग 50 फीट गहरा यह जलस्रोत नीचे जाते-जाते उल्टे पिरामिड का रूप ले लेता है, जहां तीन दिशाओं से सीढ़ियां नीचे उतरती हैं। धार्मिक नजरिए से इसे भगवान सूर्य की तेज ऊर्जा और मां गंगा के पावन जल का एक दुर्लभ और अलौकिक मिलन माना जाता है।

स्नान का अनोखा नियम और त्याग की परंपरा
लोलार्क कुंड में पूजा-अर्चना करने का तरीका आम मंदिरों से बिल्कुल अलग और बेहद खास है:
- साझा डुबकी: दंपती एक-दूसरे का हाथ थामकर कुंड के पावन जल में आस्था की डुबकी लगाते हैं।
- वस्त्र और फल का समर्पण: स्नान पूरा होते ही जोड़े अपने पहने हुए कपड़े वहीं छोड़ देते हैं। इसके साथ ही अपने आंचल में लाया गया श्रृंगार का सामान और कोई एक पसंदीदा फल या सब्जी कुंड में अर्पित कर हमेशा के लिए उसका त्याग करने का संकल्प लेते हैं।
- महादेव का आशीर्वाद: इस विधि के बाद श्रद्धालु लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन करते हैं और अपने वंश को आगे बढ़ाने का वरदान मांगते हैं।

आस्था का सैलाब और मन्नत पूरी होने की खुशी
उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और झारखंड समेत देश भर से आए श्रद्धालुओं को संभालने के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं। शुभ मुहूर्त में डुबकी लगाने की चाह में लोग पूरी रात बैरिकेडिंग के अंदर ही बिता देते हैं।
खास बात यह है कि यहां सिर्फ मन्नत मांगने वाले ही नहीं आते, बल्कि जिनकी मनोकामनाएं पूरी हो चुकी होती हैं, वे भी भगवान को धन्यवाद देने पहुंचते हैं। ऐसे परिवार कुंड पर आकर अपने बच्चों का मुंडन करवाते हैं और हलवा-पूरी का भोग लगाकर अपनी खुशियां बांटते हैं।

क्रीं कुंड पर भी बिखरी बाबा कीनाराम की भक्ति
लोलार्क षष्ठी के इस शुभ अवसर पर काशी के रविंद्रपुरी स्थित क्रीं कुंड (अघोरपीठ) में भी भक्तों का भारी जमावड़ा रहता है। वहां संत बाबा कीनाराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में विशेष स्वच्छता अभियान, भव्य आरती और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाती हैं, जिससे पूरी काशी दिनभर उत्सव के रंग में रंगी नजर आती है।

महादेव आपकी मनोकामना पूर्ण करें।
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