रहस्यमयी अलोपशंकरी मंदिर: जहाँ मूर्ति नहीं, बल्कि पालने के रूप में होती है देवी की पूजा!

क्या आपने कभी ऐसे किसी मंदिर के बारे में सुना है जहाँ देवी की कोई प्रतिमा या मूर्ति स्थापित न हो? सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के तीर्थराज प्रयागराज में एक ऐसा ही अनूठा शक्तिपीठ मौजूद है। आमतौर पर हम जब भी किसी धार्मिक स्थल पर जाते हैं, तो वहाँ देवी-देवताओं के भव्य स्वरूप और मूर्तियां हमारे स्वागत के लिए होती हैं। मगर प्रयागराज के अलोपबाग इलाके में स्थित माँ अलोपशंकरी का यह प्रसिद्ध धाम इन सभी परंपराओं से बिल्कुल जुदा है। आइए, इस पावन स्थल की कुछ खास और दिलचस्प बातों पर नजर डालते हैं।

गर्भगृह में सजे पालने के होते हैं दर्शन

इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबी यहाँ की पूजा पद्धति है। मुख्य गर्भ गृह में किसी देवी की मूर्ति के बजाय एक पारंपरिक पालना रखा रहता है, जिसे हमेशा लाल चुनरी और फूलों से बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है। यहाँ आने वाले भक्त इसी पालने को साक्षात माँ का स्वरूप मानकर अपनी प्रार्थना करते हैं। लोग यहाँ नारियल और चुनरी अर्पित करते हैं तथा अपने परिवार की सुख-शांति की दुआ मांगते हैं। इसके अलावा, इस मंदिर की एक और बड़ी परंपरा बच्चों के मुंडन संस्कार से जुड़ी है। बहुत से लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर अपने बच्चों का मुंडन कराने खास तौर पर इसी पावन धाम में आते हैं।

क्यों पड़ा इस जगह का नाम ‘अलोपशंकरी’?

इस मंदिर के नाम और इसके वजूद के पीछे एक बेहद पुरानी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता के अंगों को विभाजित किया था। ऐसा माना जाता है कि ठीक इसी जगह पर माता सती के हाथ का पंजा गिरा था और फिर वह अचानक गायब यानी अदृश्य हो गया था।

चूँकि ‘अलोप’ शब्द का मतलब ही लुप्त होना या गायब हो जाना होता है, इसलिए इस पवित्र स्थल का नाम ‘अलोपशंकरी’ पड़ गया। हालांकि, यह पूरी तरह से धार्मिक आस्था और विश्वास पर आधारित है, जिसे लोग पीढ़ियों से मानते आ रहे हैं। प्रयागराज में ललिता देवी और कल्याणी देवी मंदिरों की तरह ही इस शक्तिपीठ का भी शहर की संस्कृति में बहुत ऊंचा स्थान है।

नवरात्रि के दिनों में बढ़ जाती है रौनक

वैसे तो यहाँ साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के नौ दिनों में इस मंदिर का माहौल पूरी तरह से बदल जाता है। देश के कोने-कोने से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहाँ खिंचे चले आते हैं। इस दौरान पूरे परिसर को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और पालने का विशेष शृंगार किया जाता है। यहाँ आकर भक्तों को एक अजीब सी आंतरिक शांति और अलौकिक अनुभव की अनुभूति होती है, जो इसे बाकी सभी जगहों से बिलकुल अलग बना देता है।

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