लखनऊ में ‘पोस्टर वार’: 4 अक्टूबर की धर्म संसद से पहले अखिलेश यादव को न्योता, मथुरा मुद्दे पर सियासत गर्म

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 4 अक्टूबर को होने वाले धार्मिक सम्मेलन से ठीक पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पर विशाल मंदिर बनाने की मांग को लेकर इस बार राजनीतिक केंद्र बिंदु में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव आ गए हैं। शहर के प्रमुख चौराहों पर लगे नए पोस्टरों के माध्यम से उन्हें इस आयोजन में शामिल होने की सीधी चुनौती और न्योता दोनों दिया गया है, जिससे राज्य का राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया है।

इन पोस्टरों में अखिलेश यादव से न केवल कार्यक्रम में आकर मंदिर निर्माण पर अपनी राय स्पष्ट करने को कहा गया है, बल्कि उनकी धार्मिक प्राथमिकताओं पर भी तीखे सवाल उठाए गए हैं। पोस्टर पर सुदर्शन चक्र धारण किए हुए भगवान श्रीकृष्ण का चित्र उकेरा गया है, जिस पर ‘अयोध्या-काशी तो बस झांकी है, अब केवल मथुरा ही बाकी है’ जैसा चर्चित नारा लिखा है। इसके ज़रिए सपा अध्यक्ष से यह बताने को कहा गया है कि वे मथुरा मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं या नहीं।

यह पूरा पोस्टर अभियान ‘विश्व हिंदू रक्षा परिषद’ (VHRP) नाम की संस्था द्वारा चलाया जा रहा है। संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष बादल यादव और महिला शाखा की प्रमुख प्रियंका ठाकुर ने मिलकर अखिलेश यादव के आवास के निकटवर्ती क्षेत्रों, 1090 चौराहे और अंबेडकर चौराहे जैसी प्रमुख जगहों पर ये होर्डिंग्स लगाए हैं। आयोजकों का दावा है कि 4 अक्टूबर की इस धर्म संसद में देशभर के साधु-संत जुटेंगे और श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े अहम प्रस्ताव पारित किए जाएंगे।

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच पोस्टरों के ज़रिए संदेश देने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले सितंबर महीने में रायबरेली की ‘पीडीए यात्रा’ के दौरान सपा कार्यकर्ताओं ने अखिलेश यादव को खुद श्रीकृष्ण के अवतार में दिखाया था। इसके अलावा जनवरी 2024 में भी सपा दफ्तर के बाहर ऐसे ही पोस्टर लगाकर अखिलेश यादव से कृष्ण जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन करने की अपील की गई थी।

मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह परिसर से जुड़ा मामला लंबे समय से अदालती कार्यवाही और सार्वजनिक चर्चा का विषय रहा है। फिलहाल इन नए पोस्टरों और धर्म संसद के बुलावे पर समाजवादी पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन इसने 4 अक्टूबर के कार्यक्रम से पहले लखनऊ के सियासी गलियारों में नई बहस ज़रूर छेड़ दी है।

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