सिनेमा के बड़े पर्दे और डिजिटल स्क्रीन से बहुत पहले, जब रात के अंधेरे में नगाड़े की पहली थाप पड़ती थी, तो पूरा गांव एक जगह थम सा जाता था: जानिए ‘नौटंकी’ की अनदेखी दास्तान

सिनेमा के बड़े पर्दे और डिजिटल स्क्रीन से बहुत पहले, जब रात के अंधेरे में नगाड़े की पहली थाप पड़ती थी, तो पूरा गांव एक जगह थम सा जाता था। खुले आसमान तले सजने वाली यह महफिल उत्तर प्रदेश की लोक-संस्कृति का वो दिलकश रूप थी, जिसे दुनिया ‘नौटंकी’ के नाम से जानती है। यह सिर्फ लोगों का दिल बहलाने का जरिया नहीं थी, बल्कि समाज को आईना दिखाने और पुरानी लोक-कथाओं को घर-घर तक पहुंचाने का एक जीवंत माध्यम थी।

एक राजकुमारी का इश्क और नाम मिलने का किस्सा

क्या आप जानते हैं कि जिस ‘नौटंकी’ शब्द को आज हम आम बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं, उसकी नींव एक बेहद खूबसूरत प्रेम कहानी पर टिकी है? 19वीं सदी के दौरान आगरा और अवध के आसपास ‘स्वांग’ नाम की नाट्य परंपरा खूब लोकप्रिय थी। यह नाटक लोगों के दिलों में इस कदर उतर गया कि वे हर नाटक को ‘नौटंकी’ ही पुकारने लगे। देखते ही देखते, एक राजकुमारी का नाम इस पूरी लोक-कला शैली की पहचान बन गया।

खुली हवा, नगाड़े की थाप और संवादों का जादू

नौटंकी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे किसी आलीशान थियेटर की चौखट पसंद नहीं; यह खुले मैदानों में अपनी पैठ जमाती है। इसकी प्रस्तुति का अपना ही एक अलग मिजाज है:

  • संगीत की गूंज: शहनाई, हारमोनियम और खासकर नगाड़े का संगीत दर्शकों में जोश भर देता है।
  • शायराना और काव्यात्मक भाषा: इसमें पात्र सीधी-सादी बात करने के बजाय छंद, पद और शायरी में संवाद बोलते हैं।
  • सूत्रधार की भूमिका: एक किस्सागो (सूत्रधार) पूरी कहानी का ताना-बाना बुनता है और दर्शकों को शुरू से अंत तक जोड़े रखता है।
  • कहानियों की विविधता: लैला-मजनू का प्यार हो, महाभारत के प्रसंग हों या फिर राजा हरिश्चंद्र और भक्त प्रहलाद की गाथाएं—ऊंची आवाज और बुलंद अभिनय के साथ इन्हें लोगों के सामने पेश किया जाता है।

हाथरस के अखाड़े से कानपुर के मंच तक: दो अलग अंदाज

नौटंकी की असली नींव उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के अखाड़ों में पड़ी। शुरुआती दौर में यह पूरी तरह से पुरुषों का खेल था—यहाँ तक कि महिला पात्रों की पोशाक पहनकर अभिनय भी पुरुष ही करते थे।

जब यह कला हाथरस से निकलकर कानपुर पहुंची, तो इसके दो अलग-अलग घराने या शैलियां बनकर उभरीं:

  1. हाथरस शैली: यह अपनी पुरानी ‘स्वांग’ परंपरा के करीब रही, जिसमें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और गायकी को सबसे ज्यादा तवज्जो दी गई।
  2. कानपुर शैली: इस शैली में संगीत से ज्यादा जोर कलाकारों के डायलॉग, हाव-भाव और दमदार अदाकारी (ड्रामा) पर दिया गया।

हाथरस की अखाड़ा संस्कृति से शुरू होकर पूरे उत्तर प्रदेश के लोक-जीवन में रच-बस जाने वाली ‘नौटंकी’ आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल और रंगीन हिस्सा है।

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