लखनऊ की कचहरी रोड पर गरजा प्रशासन: अदालत के कड़े रुख के बाद अवैध चैंबरों पर चला बुलडोजर, भारी फोर्स तैनात

30 अगस्त की सुबह लखनऊ का कचहरी मार्ग आम दिनों जैसा नहीं था। चारों तरफ पुलिस बल की भारी मौजूदगी और प्रशासनिक हलचल के बीच जब नगर निगम की पीली गाड़ियां (बुलडोजर) आगे बढ़ीं, तो लंबे समय से जमे अवैध कब्जों के जमींदोज होने की शुरुआत हो गई। तय समय-सीमा खत्म होते ही प्रशासन ने सरकारी जमीन पर बने वकीलों के चैंबरों को ध्वस्त करने का काम पूरी कड़ाई के साथ शुरू कर दिया।

अदालती आदेश और सुप्रीम कोर्ट से झटका इस बड़ी कार्रवाई की नींव दरअसल अदालती प्रक्रिया से पड़ी थी। अधिवक्ता अनुराधा सिंह, देवांशी श्रीवास्तव और अरुणिमा श्रीवास्तव द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कड़े निर्देश दिए थे। जब इस फैसले को चुनौती देने के लिए लखनऊ के वकील देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) पहुंचे, तो वहां से भी उन्हें कोई राहत या स्टे नहीं मिल सका। शीर्ष अदालत का रुख साफ होने के बाद नगर निगम ने 29 अगस्त तक स्वतः कब्जा हटाने का अंतिम अवसर दिया था, जिसके बीतते ही 30 अगस्त को बुलडोजर एक्शन में आ गया।

कानूनी प्रक्रिया और 72 ठिकानों की पहचान मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने पहले ही अधिकारियों को पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए थे। इसके तहत कुल 72 अतिक्रमणकारियों को दोबारा सूचना भेजने, नोटिस न लेने की स्थिति में उसे दीवार पर चस्पा करने और हिंदी व अंग्रेजी के प्रमुख अखबारों में इश्तहार प्रकाशित कराने का आदेश दिया गया था। इसके बाद सभी पक्षों को 10 दिन का पर्याप्त समय दिया गया था।

नालियों से लेकर फुटपाथ तक फैली थी अनधिकृत दुकानें कार्रवाई की जद में सिर्फ अस्थायी केबिन ही नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील जगहें शामिल थीं। सड़क के किनारे, आम लोगों के चलने वाले फुटपाथ, निबंधन (रजिस्ट्री) कार्यालय के सामने की जमीन और यहां तक कि नालियों के ऊपर पक्के निर्माण कर दुकानें तक चलाई जा रही थीं। इन सभी को सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा और नियमों का उल्लंघन माना गया।

छुट्टी के दिन भी बना रहा तनाव का माहौल कार्रवाई से ठीक पहले, छुट्टी का दिन होने के बावजूद कचहरी परिसर में गहमागहमी का माहौल रहा। नोटिस लगने और मियाद पूरी होने की खबर मिलते ही बड़ी संख्या में वकील अपने चैंबरों के पास एकत्र हो गए। कई अधिवक्ता अपने निर्माण को वैध साबित करने के लिए दस्तावेजों को खंगालते और प्रशासनिक अधिकारियों से बात करते नजर आए। हालांकि, अदालत के स्पष्ट निर्देशों और पुलिस की मुस्तैदी के आगे उनकी एक न चली और अंततः सड़क व नाले की जमीन को पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त करा लिया गया।

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